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2019 में सोने की मांग में रही कमी, कीमतों की वजह से उपभोक्ता मांग में आई कमी ईटीएफ में निवेश पर पड़ी भारी
January 30, 2020 • SRISHTI SHARMA • बिज़नेस

                                         

 2019 में सोने की मांग में रही कमी, कीमतों की वजह से उपभोक्ता मांग में आई कमी ईटीएफ में निवेश पर पड़ी भारी

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की नई गोल्ड डिमांड ट्रेंड्स रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में सोने की वैश्विक मांग घटकर 4,355.7 टन रही जो 2018 के मुकाबले 1 फीसदी कम है। वर्ष 2019 साफ तौर पर दो हिस्सों में बंटा रहा, पहले छह महीने में लगभग सभी क्षेत्रों में मजबूती और वृद्धि देखने को मिली, वहीं दूसरी छमाही में कमजोरी देखने को मिली।
केंद्रीय बैंकों की मांग दूसरी छमाही में सुस्त हुई और 38 फीसदी कम हो गई इसके उलट पहली छमाही में केंद्रीय बैंकों की मांग में 65 फीसदी बढ़ोतरी देखने को मिली थी। हालांकि इसका प्रमुख कारण खरीदारी का स्तर रहा जो कुछ तिमाहियों तक जारी रहा। सालाना खरीदारी अब भी 650.3 टन के महत्वपूर्ण स्तर पर रही जो 50 वर्षों में दूसरा सर्वोच्च स्तर रहा और 2019 के मुकाबले सिर्फ 6 टन कम रहा। सोना आधारित एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में निवेश सामान्य रुझानों के विपरित रहा और इन उत्पादों में निवेश साल के पहले नौ महीनों के दौरान काफी मजबूत रहा और तीसरी तिमाही में 255.5 टन के स्तर पर पहुंच गया। चैथी तिमाही में यह गति थोड़ी सुस्त पड़ी और निवेश कम होकर 26.4 टन रहा (सालाना आधार पर 77 फीसदी कम)। सोने की सालाना आपूर्ति 2 फीसदी बढ़कर 4,776 टन रही। यह वृद्धि सीधे तौर पर रिसाइकलिंग और हेजिंग से हुई, खान उत्पादन 1 फीसदी कम रहकर 3,436.7 टन रहा। 
एलिस्टर हेविट, प्रमुख, मार्केट इंटेलिजेंस, वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने कहा “2019 के दौरान सोने आधारित ईटीएफ की मांग में तेजी आई क्योंकि निवेशक अपने पोर्टफोलियो में विविधता लाना चाहते हैं और अन्य बाजारों की अनिश्चतताओं से बचने के लिए हेज करना चाहते हैं। फ्यूचर पोजिशनिंग में जबरदस्त तेजी के साथ इन निवेशों की वजह से डॉलर सोने कीमतों में तेजी आई और वे छह वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंच गए। लेकिन खुदरा निवेश और आभूषण मांग में गिरावट आई, मुख्य रूप से साल की दूसरी छमाही में कीमतों में आई तेजी के कारण। आने वाले दिनों में हमें उम्मीद है कि सोने की सुरक्षित निवेश होने की खूबी निवेशकों के दिमाग में छाई रहेगी क्योंकि उन्हें वैश्विक तनावों, कम कमाई और इक्विटी के मूल्यों का सामना करना पड़ेगा।”
खास तौर पर चैथी तिमाही में सोने की मांग पिछले वर्ष की समान अवधि में जबरदस्त मांग के मुकाबले 19 फीसदी कम होकर 1,045.2 टन रही। चैथी तिमाही के दौरान सालाना आधार पर आई गिरावट के पीछे दो प्रमुख कारक आभूषणों की मांग और गोल्ड बार में निवेश थे जिनमें गिरावट सोने की कीमतों की वजह से आई। 
सोने आधारित ईटीएफ और ऐसे ही अन्य उत्पादों में निवेश से वैश्विक होल्डिंग साल के आखिर में रिकॉर्ड 2,885.5 टन के स्तर पर पहुंच गई। साल के दौरान होल्डिंग 401.1 टन से भी ज्यादा बढ़ गई और 2019 की चैथी तिमाही के दौरान 26.8 टन बढ़ोतरी हुई। निवेश में 2019 की तीसरी तिमाही के दौरान काफी तेजी आई क्योंकि डॉलर सोने की कीमतें बढ़कर छह वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंच गई। सहज मौद्रिक नीतियों और वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के साथ खरीदारी के माहौल ने 2019 के दौरान इस क्षेत्र में निवेश को गति देने में अहम भूमिका निभाई।  
केंद्रीय बैंक लगातार दसवें वर्ष शुद्ध खरीदार रहे, वैश्विक रिजर्व 650.3 टन (सालाना आधार पर 1 फीसदी कम) बढ़े, 50 वर्षों में दूसरा सालाना सर्वोच्च स्तर। केंद्रीय बैंकों की खरीदारी 2019 की चैथी तिमाही में सुस्त पड़ी, सालाना आधार पर 34 फीसदी कम हुई, हालांकि यह 2018 में की गई खरीदारी के स्केल का परिणाम था। 
वैश्विक उपभोक्ता मांग में चीन और भारत का रहा बोलबाला। 2019 की चैथी तिमाही में आभूषणों और खुदरा निवेश मांग में सालाना गिरावट में सोने की खपत करने वाले इन दो प्रमुख देशों की हिस्सेदारी करीब 80 फीसदी रही, जहां क्रमश 10 फीसदी और 16 फीसदी की गिरावट देखने को मिली। सोने की तेज और अस्थिर कीमतें और कमजोर आर्थिक परिवेश इसके पीछे प्रमुख कारण रहे।
सोने की वार्षिक आपूर्ति 2 फीसदी बढ़कर 4,776.1 टन रही। इस बढ़ोतरी का प्रमुख कारण रिसाइकलिंग में 11 फीसदी की बढ़ोतरी रही क्योंकि उपभोक्ताओं ने साल की दूसरी छमाही में सोने की कीमतों में आई जबरदस्त तेजी का लाभ उठाया। सालाना खान उत्पादन मामूली रूप से कम रहकर 3,463.7 टन के स्तर पर रहा- पिछले 10 वर्षों के दौरान यह पहली सालाना गिरावट है।
चैथी तिमाही में सोने की कीमत औसतन 1,481 डॉलर प्रति औंस रही - 2013 की पहली तिमाही के बाद से यह सर्वोच्च तिमाही औसत है। हालांकि, कीमत तीसरी तिमाही के उच्च स्तर 1,550 डॉलर प्रति औंस से नीचे बनी रहीं और पूरी तिमाही के दौरान यह स्तर बना रहा। यूरो, भारतीय रुपये और तुर्किश लीरा समेत कई मुद्राओं में सोने की कीमतें ऐतिहासिक तौर पर अपने सर्वोच्च स्तर तक पहुंच गईं।