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खनन क्षेत्र में तनाव से देशभर में आजीविका व सामाजिक उथल-पुथल का संकट पैदा हुआ है : रिपोर्ट
January 23, 2020 • SRISHTI SHARMA • आलेख

60 प्रतिशत से ज्यादा लोगों का मानना है कि खनन पर प्रतिबंध से उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है

नई दिल्ली : भारत के अग्रणी सोशल चेंज ऑर्गनाइजेशन फोरम फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट एंड रिसर्च (एफआईडीआर) ने आज भारत के पांच बड़े खनन वाले प्रदेशों में सर्वेक्षण के आधार पर तैयार रिपोर्ट जारी की है। भारत में खनन को लेकर यह रिपोर्ट अपनी तरह की पहली रिपोर्ट है तथा यह खनन उद्योग व इससे जुड़ी आजीविकाओं के प्रति लोगों के विचार सामने आए हैं। विभिन्न राज्यों में खनन पर रोक व प्रतिबंधों के कारण लोगों की आजीविका पर पड़ा असर इस अध्ययन में सामने आया है। सामाजिक तानाबाना छिन्न-भिन्न होने का खतरा है और देशभर में खनन पर निर्भर लाखों लोगों की आजीविका का संकट है। गोवा में खनन प्रतिबंध ने सामाजिक ताने-बाने पर गहरा दुष्प्रभाव डाला है। सर्वेक्षण में सबसे चिंताजनक बात यह सामने आई है कि खनन रुकने से आजीविका पर आए संकट के कारण पूरे समाज की शांति एवं समृद्धि छिन गई है। गोवा और कर्नाटक दोनों राज्यों में काफी हद तक एक जैसी स्थिति है।

'माइनिंग, ए पूडेंट पर्सपेक्टिव के शीर्षक से जारी यह रिपोर्ट भारत में खनन से जुड़े पांच अहम राज्यों गोवा, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और कर्नाटक में किए गए सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई है। सर्वेक्षण में अलग-अलग परिवेश,आयु, लिंग एवं शैक्षणिक स्तर के लोगों को शामिल किया गया था। यह रिपोर्ट इन पांचों राज्यों में विशाल खनन क्षेत्र में मौजूदा सामाजिक आर्थिक स्थिति की तुलना करने और उनके विश्लेषण का मौका देती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, खनन पर प्रतिबंध से केवल खनन पर निर्भर परिवारों पर ही नहीं बल्कि उन परिवारों पर भी दुष्प्रभाव पड़ा है, जिनकी आजीविका किसी स्तर पर इससे जुड़ी है। खनन पर प्रतिबंध के बाद से घरेलू आय आधी से भी कम रह गई है, जिससे बेरोजगारी एवं वित्तीय संकट के कारण बढ़े तनाव के चलते घरेलू हिंसा के मामले भी बढ़े हैं। खनन बंद करने के नीतिगत निर्णय से सबसे ज्यादा महिलाएं एवं बच्चे प्रभावित हुए हैं। सर्वेक्षण में शामिल 70 प्रतिशत लोगों ने माना कि खनन से उन्हें रोजगार मिला था लेकिन आज ये रोजगार खत्म हो गए हैं। 65 प्रतिशत ने माना कि उनका परिवार गहरे तनाव में है और कर्ज लेकर नहीं चुका पाने व कर्जदाताओं के उत्पीड़न तथा मद्यपान एवं अन्य सामाजिक बुराइयों से पीड़ित है। 27 प्रतिशत ने कहा कि आजीविका पर संकट के कारण मानसिक अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा है। इस तरह की प्रतिक्रिया सबसे ज्यादा गोवा से सामने आई।

सर्वेक्षण में शामिल ज्यादातर लोगों ने माना कि कानुनी अस्थिरता और कमजोर खनन नीति ने निवेशकों का भरोसा कमजोर किया है, जिससे भारत में खनन का भविष्य अनिश्चितता में है।

90 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कहा कि रियल एस्टेट में कीमतें कम होने से भी आर्थिक गतिविधियों पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ा है, क्योंकि यह आजीविका का वैकल्पिक साधन हो सकता था। यह क्षेत्र भी लोगों की आर्थिक स्थिरता एवं भविष्य की समृद्धि के लिए अहम है।

अध्ययन के बारे में एफआईडीआर से जुड़े श्री चारुदत्त पाणिग्रही ने कहा, "इस रिपोर्ट का उददेश्य समाज में खनन उद्य ग की भूमिका को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में लाते हुए भारत के उन लोगों की आवाज को सामने लाना है, जिनके जरिये भारत में खनिज एवं ऊर्जा संसाधनों का प्रबंधन होता है। यदि देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है, तो इन सभी बातों को ध्यान में रखा जाना जरूरी है। ऐसे में जब कि निवेशकों की धारणा पहले से ही कमजोर बनी हुई है और वैश्विक स्तर पर अस्थिरता है, इस स्थिति में विभिन्न राज्यों में लगातार खनन पर प्रतिबंध से पड़ने वाले आर्थिक असर को संभालना हमारी अर्थव्यवस्था के लिए मुश्किल होगा। अगर देश में खनन उद्योग को प्रभावित करने वाली यह स्थिति बनी रही, तो हमारी अर्थव्यवस्था मुश्किल के मुहाने पर खड़ी हो जाएगी।"

उन्होंने आगे कहा, “मुझे उम्मीद है कि सभी प्राइमरी और सेकेंडरी स्टेकहोल्डर्स तक यह रिपोर्ट पहुंचने से उन्हें खनन के अनुकूल नीतियां, नियम, नियमन बनाने की दिशा में सरकार व अन्य संबंधित विभागों के समक्ष अपना पक्ष रखने में मदद मिलेगी। साथ ही, खनन गतिविधियों को पुनः प्रारंभ कराना, वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था करना एवं इससे जुड़े लोगों की मदद का रास्ता तैयार होगा।"

भारत में खनन उद्योग कोयला उत्पादन के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर, लौह अयस्क के मामले में चौथे, क्रूड़ स्टील के मामले में पांचवें और एल्यमीनियम के मामले में आठवें स्थान पर है। भारत के विस्तत खनिज लौह अयस्क, क्रूड स्टील, एल्युमीनियम, लाइमस्टोन आदि को बेहतर प्रबंधन की जरूरत है। भारत के जीडीपी में खनन उद्योग का हिस्सा 2018-19 में 26 प्रतिशत रहा था, जो 2011-12 में 3 प्रतिशत था।

एफआईडीआर के डायरेक्टर श्री सिद्धार्थ बेहरा ने कहा कि दिल्ली में 23 जनवरी, 2020 को आजीविका को हुए नुकसान एवं तनाव व इससे परिवार पर पड़ने वाले असर को केंद्र में रखते हुए एक दिवसीय सिंपोजियम कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान पैनलिस्ट और वक्ता इस बात पर एकमत दिखे कि खनन गतिविधियां बंद होने के कारण पहले से ही आर्थिक दबाव झेल रहे समुदाय के लिए सतत आजीविका सुनिश्चित करने की दिशा में सिविल सोसायटी को भूमिका निभानी चाहिए।

एफआईडीआर के सर्वेक्षण के मुताबिक, पांचों राज्यों में खनन औसतन वहां के जीडीपी में 12 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है। खदानों के बंद होने से इस बात की संभावना धूमिल हुई है कि विभिन्न राज्य भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने में उल्लेखनीय रूप से योगदान कर पाएंगे। गोवा में लौह अयस्क खनन पर रोक से 34 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान है, जो राज्य सरकार का आकलन है। राज्य में खनन गतिविधियां बंद होने से इस पर निर्भर कई अन्य सेग्मेंट भी प्रभावित हुए हैं। इसने उद्योग के संबंधित पक्षों को आय के मामले में विकल्पहीन बना दिया है। गोवा की हालत ज्यादा जटिल है, क्योंकि यहां 3 लाख से ज्यादा आजीविका पर संकट है और इसमें सुधार का कोई संकेत भी नहीं दिख रहा है। नागरिकों की सुरक्षा के लिए सरकार को राज्य के हित में कानूनी या विधायी तरीके से खनन गतिविधियां पुनः प्रारंभ कराने के लिए तत्काल एवं निर्णायक कदम उठाना चाहिए। एक समय सर्वाधिक प्रति व्यक्ति आय वाला गोवा इस समय गंभीर स्थिति में है, क्योंकि यहां लोगों की आय बुरी तरह से प्रभावित हुई है और जीवन स्तर नीचे गिर रहा है। गोवा, ओडिशा और कर्नाटक जैसे राज्यों में खनन पर लगातार रोक से न केवल राजस्व व रोजगार का नुकसान हो रहा है, बल्कि निवेशकों का भरोसा भी कमजोर हो रहा है, जिससे आगे चलकर राज्य की अर्थव्यवस्था पर दुष्प्रभाव पड़ेगा।

एफआईडीआर एक गैर लाभकारी सामाजिक संगठन है, जो लोगों के जीवन में बदलाव लाने की दिशा में कार्यरत है। नीतियों के निर्माण से लेकर उनके क्रियान्वयन तक एफआईडीआर देशभर में कार्य करने वाला संगठन है